किरण बेदी अचानक भ्रष्ट हो गईं। जब तक वो पुलिस की आला अफसर थीं तबतक उनपर कोई दाग नहीं लगा और न ही उन्हें किसी ने कभी बेईमान कहा। तुनकमिजाज की उनकी इमेज हमेशा से रही और इसी वजह से उन्हें दिल्ली का पुलिस कमिश्ननर नहीं बनाया गया। लेकिन अब उनपर लांक्षन लग रहे हैं। टीवी और अखबार वाले जमकर छाप और दिखा रहे हैं।
इन आरोपों के बीच मुझे याद आया कि कैसे जंतर-मंतर अनशन के बाद अरविंद, अन्ना और भूषण परिवार पर ताबड़तोड़ आरोप मढ़े गए थे। कभी आरोप लगा कि अन्ना के ट्रस्ट के पैसे का दुरुपयोग उनका जन्म दिन मनाने में हुआ। शांति भूषण और प्रशांत भूषण ने जमीन खरीदने के खेल में भ्रष्ट आचरण किया। अरविंद को कैसे इनकम टैक्स विभाग ने बताया कि भाई आपको भी नौ लाख रुपये चुकाने हैं। करने को ये सवाल किया जा सकता है कि आंदोलन के पहले ये मामले क्यों नहीं आए? आंदोलन के बाद अचानक इनकी बाढ़ सी क्यों आ गई? एक केंद्रीय मंत्री ने आंदोलन के दौरान मुझे नसीहत देने की कोशिश की थी कि कैसे खोजी पत्रकारिता खत्म हो गई है और अब पत्रकार खोजते नहीं हैं, उन्हें खबरें देनी पड़ती हैं। फिर बड़े घमंड से उन्होंने बखान किया कि कैसे उन्होंने बाबा रामदेव को ध्वस्त किया। और अब वो अन्ना और उनकी टीम के खिलाफ लगे हैं। अच्छा लगा कि चलो एक मंत्री पत्रकार बन गया है। ताकि समाज से भ्रष्टाचार खत्म हो लेकिन ये कतई अच्छा नहीं लगता जब यही मंत्री महोदय कहते हैं कि टू जी और कॉमनवेल्थ में कोई घोटाला नहीं हुआ।
बड़ा सवाल ये नहीं है कि सरकार के इशारे पर ये सब कुछ हो रहा है। ऐसा जेपी के जमाने में भी हुआ था और वीपी सिंह के जमाने में भी। और हर आंदोलन को कुचलने के लिए इस तरह के कुचक्र रचे जाते हैं। और इस खेल में सत्ता को खुश करने में लगे कुछ पत्रकार और संपादक खुशी-खुशी अपनी भूमिका भी निभाते हैं। ये लोग खुशी-खुशी कहते भी हैं कि जो लोग खुद भ्रष्ट आचरण के शिकार हैं उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाने का हक नहीं है। मानो ये कह रहे हों कि आओ हम सब दुनियाभर के भ्रष्ट एक हों। इन लोगों का बस चलता तो ये कभी भी किसी वाल्मीकि को रामायण की रचना नहीं करने देते। क्योंकि डाकू कैसे रामारण लिख सकता है?
बड़ा सवाल है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ बने माहौल को बनाए रखने का। हर आंदोलन कामयाब हो यह जरूरी नहीं है। हर आंदोलन जन आंदोलन बन जाए ये भी जरूरी नहीं है। हर आंदोलन सरकार की नींव हिला दे ये भी जरूरी नहीं है। अन्ना के आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसने भ्रष्टाचार, जिसे पूरे देश ने अपना राष्ट्रीय चरित्र बना लिया था, के खिलाफ खड़ा कर दिया। इस आंदोलन ने हर व्यक्ति को अपने खिलाफ खड़ा कर दिय़ा। अपने भाई, अपने पिता, अपने रिश्तेदार के खिलाफ खड़ा कर दिया क्योंकि आज की तारीख में कोई ऐसा घर नहीं बचा है जहां कोई भ्रष्ट नहीं है। लोगों को लगता है कि वो सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हुआ है। हकीकत में सरकारी दफ्तरों में घूस लेने वाला अफसर और क्लर्क हमारे आपके परिवार से ही तो आते हैं। वो सरकार के खिलाफ बगावत करने से पहले अपने परिवार के खिलाफ बगावत पर उतारू हो गया है। इस आग को जिंदा बचाए ऱखने की जरूरत है क्योंकि ये हमारे समाज की सोच में बुनियादी बदलाव का प्रतीक है। और अगर ऐसा हो गया तो हमारे राष्ट्रीय चरित्र में बदलाव आएगा। इसके लिये इस आंदोलन का जिंदा रहना जरूरी है।
किसी भी आंदोलन की कामयाबी के लिए तीन चीजें आवश्यक होती हैं। एक, नेतृत्व की साख। दो, आंदोलन का संगठन और तीन, आंदोलन के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम। भ्रष्टाचार विरोधी इस आंदोलन का नेतृत्व अन्ना के हाथ में है। जनता ने उनके तप पर यकीन किया, लोग जुटते चले गए। वरना इस देश में सैकड़ों लोग अनशन करते हैं और लोग उनकी तरफ देखना भी गंवारा नहीं करते। अन्ना की साख पर चोट करने की कोशिश सरकार और कांग्रेस ने की लेकिन कामयाब नहीं हुए। अब कोशिश है कि अन्ना को छोड़कर उनके साथ के लोगों की साख को मिट्टी में मिला दिया जाए। इससे दो फायदे होंगे। एक, अन्ना और उनकी टीम में अविश्वास का वातारण बनेगा, फूट पड़ेगी और अन्ना को उनकी टीम से दूर करने में मदद मिलेगी। जो आंदोलन के नेतृत्व को कमजोर करेगा। महाराष्ट्र के कई बड़े नेता इस काम में लगे हुए हैं और लगातार अन्ना को समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि लोग उनका इस्तेमाल कर के अपना उल्लू साध रहे हैं।
दो, अन्ना की नजर भले ही न बदले लेकिन जनता की नजर में टीम अन्ना की साख गिरी तो भी आंदोलन कमजोर होगा। तो इसलिए भी जानबूझकर टीम अन्ना के खिलाफ कुप्रचार किया जा रहा है। ये बिलकुल उसी तरह है जैसे जेपी आंदोलन के दौरान इंदिरा सरकार और कांग्रेस ने कहना शुरू किया था कि जेपी गलत लोगों से घिर गए हैं। वो आरएसएस और जनसंघ के बंधक बन गए हैं। ये कहा गया था कि जनसंघ तो फासीवादी है और ऐसे फासीवादी का जेपी से याराना क्यों? जेपी 1942 की लड़ाई के महान योद्दा थे। जवाहर लाल नेहरू तक उनकी मेधा और उनके तेजवान चरित्र से वाकिफ थे। इंदिरा गांधी उन्हीं नेहरू की संतान थीं। उन्हें जेपी की नैतिक शक्ति का एहसास था। वो जानती थीं कि जेपी को किसी और कारण से नहीं, बस वैचारिक स्तर पर ही डिगाया जा सकता है। जेपी उनकी रणनीति को समझते थे। इसलिए उन्होंने समाजवादियों, सर्वोदयी और गांधीवादी नेताओं की नाराजगी मोल लेते हुये साफ कहा अगर जनसंघ फासावादी है तो मैं भी फासीवादी हूं। जेपी संघ की विचारधारा से वाकिफ थे लेकिन वो ये भी जानते थे कि आंदोलन की कमान उनके हाथ में है संघ के नहीं। इसलिए आंदोलन की भूमिका और दिशा को तब तक खतरा नहीं होगा जबतक वो फैसले करते हैं।
सरकार का भुलावा और छलावा तो चलता रहेगा। क्य़ोंकि एक महान राष्ट्रीय आंदोलन की कोख से निकली कांग्रेस आजादी के बाद आंदोलन करना भूल गई है। सत्ता ही उसका चरित्र है। कांग्रेस ने हर जनांदोलन को अपने लिए खतरा माना चाहे वो जेपी का आंदोलन हो या फिर वीपी का या किसानों का हो या अलग राज्य का। जरूरत है इस प्रवृत्ति को नए सिरे से लोकतांत्रिक करने की। कांग्रेस के लोकतांत्रिक होने की। क्योंकि लोकतंत्र है तो देश है। किरण बेदी तो आती-जाती रहेंगी।
http://khabar.ibnlive.com/blogs/16/677.html
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