महिला दिवस: भ्रूण हत्या के खिलाफ अकेली लड़ाई
Mon, 03/07/2011 - 01:43 — Anonymous
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वह अकेली चली थी जानिबे मंजिल मगर लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गयां। ये पंक्तियां दो वर्ष पूर्व भ्रूण परीक्षण व कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध समाज के खिलाफ बिगुल फूंकने का साहस करने वाली महिला चिकित्सक डा मीतू खुराना पर बिल्कुल सटीक बैठती है।
अपने साथ हुए अत्याचार को हथियार बनाकर अकेले ही कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ मुहिम शुरू करने वाली राजधानी दिल्ली की इस महिला चिकित्सक के साथ आज देश विदेश की हजारों महिलाएं जुड़ी है और इस कृत्य के खिलाफ आवाज उठाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित कर रहीं है।
हालांकि सबकुछ शुरू से ही इतना आसान नहीं था। आरम्भ में उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा लेकिन डा मीतू ने हार नहीं मानी। परिणाम स्वरूप इस महिला की मुहिम अब घर की दहलीज व देश की सीमा पार कर दुनियां के अन्य देशों तक पहुंच गई है।
यह कहानी है जनकपुरी ए ब्लाक में रहने वाली महिला डा. मीतू खुराना की है। डा एसी खुराना की दो बेटियों में से एक मीतू ने वर्ष 2000 में पुणे से एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर राजधानी के रेलवे अस्पताल में कार्य करने लगी। वर्ष 2004 में घरवालों ने उनकी शादी राजधानी के ही एक चिकित्सक डा कमल खुराना से हुई। वर्ष 2005 में जब वह गर्भवती हुई तो ससुरालवालों ने भ्रूण परीक्षण के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया। विरोध करने पर बहाने से भ्रूण की जांच करा ली गई और गर्भ में जुड़वा बच्चियों की बात पता लगते ही गर्भपात के लिए दबाव डालने लगे। मना करने पर उन्हें तरह तरह से प्रताडि़त किया जाने लगा और अन्त में उन्हें घर से बाहर निकाल दिया गया।
इतना होने के बावजूद मीतू ने हार नहीं मानी और पति व ससुराल के लोगों सहित अस्पताल प्रशासन के खिलाफ मुहिम छेड़ दी। तमाम धमकियों व दबावों को झेलते हुए मीतू ने अकेले ही लड़ाई शुरू कर दी। पांच वर्ष की दो पुत्रियों के साथ अदालत, पुलिस व महिला आयोग के चक्कर काटने वाली मीतू ने ऐसी महिलाओं की सहायता शुरू की और आज देश विदेश की 12 हजार से अधिक महिलाएं उनकी मुहिम में शामिल है।
पिछले दो वर्ष से अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन वाशिंगटन सिटी, सैन फ्रांसिस्को, मेलबर्न, सिंगापुर, दुबई व राजधानी दिल्ली सहित कोलकाता, चेन्नई, मुम्बई व अन्य शहरों में महिलाएं कन्या भ्रूण हत्या व लिंग परीक्षण के खिलाफ तमाम जागरुकता कार्यक्रम का आयोजन करती है।
अंतत: हाईकोर्ट ने उनके पति को प्रतिमाह 8 हजार गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए। यह मामला अभी अदालत में चल रहा है। हालांकि डा मीतू खुराना इसका सारा श्रेय अपने पिता डा एसी खुराना व परिवार के अन्य सदस्यों को देती है।
प्रताड़ना के दिनों को याद करते हुए मीतू कहती है कि पढ़ी लिखी व सक्षम होने के बावजूद उनकी बच्चियों को बोझ समझा गया और उनकी हत्या करने की साजिश रची गई। बच्चियों के ऐवज में पैसे आदि की मांग की जाने लगी। बाद में उन्हें प्रताडि़त कर घर से निकाल दिया गया। हालांकि शासन प्रशासन के रवैये से वह काफी आहत हैं फिर भी उन्होंने चुप रहने के बजाए लड़ने का और दूसरों को जागरूक करने का फैसला लिया।
साभार: अविनाश चन्द्र,
दैनिक जागरण
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